Released in 1986, Jaanbaaz remains one of the most stylish and ambitious films of 1980s Hindi cinema. Produced and directed by Feroz Khan, the film blended family drama, romance, action, and crime within a visually lavis...
View on Facebookइज्जत और ईमानदारी की जिँदगी बसर करने वाले, रत्नाकर बाबू को देश के दुश्मनों ने इसलिए मौत के घाट उतार डाला! क्योंकि वो किसी भी कीमत पर उनसे मिलने के लिए तैयार न था। ईमान और बेईमानी की इस कशमकश में रत्नाकर की बीबी भी मार डाली गई, और उसकी जवान बेटी भी अपनी जान पर खेल गई, मगर उसका होनहार बेटा शेखर बदले की आरजू दिल में लिए, जान बचाकर भाग निकला।
कई साल बीत गये.......... ! अब शेखर एक खुबबुरू नौजवान था। अपने बदले की आग को ठँडा करने के लिए उसने अपनी जिन्दगी का एक ऐसा ास्ता एख्तायार किया जिसके हर मोड़ पर खतरा तो था, मगर बदला लेने का पूरा उम्मीद..........।
स्मगलरों के सिन्डीकेट में शामिल होकर, वो खुद एक स्मगलर बन गया था। मगर ये एक ऐसा राज था, जो सिवाय शेखर के और कोई भी न जानता था। यहाँ तक के उसका जिगरी दोस्त एस.पी. राजेश इस हकीकत से बेखबर था।
शेखर के बचपन की महजोली सीमा जब वर्षों के बाद उसे मिली तो दोनों के जवान दिलो की घड़कन देखते ही देखते शहनाई की आवाज में गुम हो गई, शेखर और सीमा की शादी हो गई। मगर अभी कुछ ही देर गुजरी थी के शेखर की असलियत रफ्ता सीमा पर खुलने लगी।
सरकारी अफसर की बेटी देश और देश की मर्यादा से प्यार करने वाली जब मालूम हुआ, के उसका पति देशद्रोही है। तो उसके लिए सारी दुनिया में अन्धेरा हो गया और वो पति का घर छोड़कर अलग रहने लगी।
सीमा से अलग होने के कारण शेखर और भी तड़प के रह गया। गैर कानूनी कारोबारियों और देशद्रोही से उसे खुद भी नफरत थी, मगर बदले की सुलगती हुई आग में उसे अपने मां, बाप और बहन की चिखों की आवाज आज भी सुनाई देती थी।
इस आग को हमेशा के लिए ठँडा करने के लिए उसने अपने दुश्मन से गिन गिन कर बदला लिया। और उनकी काली करतुतों के चेहरे से बेइमानी का परदा हटाकर देशभक्ति का एक ऐसा सबुत दिया, जिसकी मिसाल बड़ी मुश्किल से मिलती है।
ये सब कुछ कैसे हुआ, उसका जवाब आपको परदाशमीम पर मिलेगा।
(From the official press booklet)